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Chaitra Navratri 2021: चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से शुरू, जानें मां दुर्गा के नौ स्वरुप और पूजा के बारे में

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Chaitra Navratri 2021: चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से शुरू, जानें मां दुर्गा के नौ स्वरुप और पूजा के बारे में

शुभ चैत्र नवरात्रि (Photo Credits: File Image)

नवरात्रि, (नवदुर्गा) मां दुर्गा के नौ रूपों को पूजा जानेवाला नौ दिनों का त्योहार है. सभी नौ दिन माता आदि शक्ति के विभिन्न रूपों को समर्पित हैं. देवी के ये नौ रूप, नवग्रहों के प्रभुत्व और उनसे जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए भी उनकी पूजा की जाती है. नवरात्रि साल में दो बार मनाई जाती है जिसे चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2021) और शारदीय नवरात्रि (Sharadiya Navratri) के रूप में जाना जाता है. चैत्र नवरात्रि मार्च या अप्रैल के महीनों के दौरान आती है. चैत्र नवरात्रि को वसंत नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है. इस साल चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल को मनाई जाएगी. यह भी पढ़ें: Chaitra Navratri 2020 Messages: इन भक्तिमय हिंदी Wishes, WhatsApp Stickers, Facebook Greetings, Photos, GIF, SMS और वॉलपेपर्स को भेजकर प्रियजनों से कहें शुभ चैत्र नवरात्रि

चैत्र नवरात्रि में शारदीय नवरात्रि के अधिकांश रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है. जिसमें घटस्थापना, पूजा विधान शरद नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि दोनों में ही समान हैं. उत्तर भारत में चैत्र नवरात्रि अधिक लोकप्रिय हैं. महाराष्ट्र में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत गुड़ी पड़वा से होती है और आंध्र प्रदेश में इसकी शुरुआत उगदी से होती है. चैत्र नवरात्रि के दौरान हर दिन मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा होती है.

शैलपुत्री: चैत्र नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है. माता के इस रूप का नाम हेमवती और पार्वती भी है. यह वृषभ यानी बैल की सवारी करती हैं, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा (धनुषाकार) भी कहा जाता है. ये अपने दो हाथ – दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं. माता का यह रूप सुखद और आनंदित करता है. ग्रह: चंद्रमा – माता शैलपुत्री आदि शक्ति का रूप हैं, जो चंद्रमा के पतन के किसी भी बुरे प्रभाव को नियंत्रित करता है. इस दिन ग्रे रंग पहना जाता है. इस दिन ‘या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

ब्रह्मचारिणी: माता ने ब्रह्मचारिणी रूप में फलों और फूलों के आहार के साथ 1000 साल बिताए, और धरती पर सोते समय पत्ते और पत्तेदार सब्जियों का आहार कर 100 साल बिताए. माता ने भगवान शिव की पूजा के दौरान 3000 वर्षों तक केवल बेल पत्र (पत्तों) को खाया. अपनी तपस्या को और कठिन बनाने के लिए, माता ने बेल पत्र खाना भी बंद कर दिया और बिना किसी अन्न-जल के तपस्या जारी रखी. पत्तियां खाने के कारण माता के इस रूप को अपर्णा के नाम से जाना जाता है. माता नंगे पांव रहती हैं. अपने दाएं हाथ में माता जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं. इस दिन नारंगी रंग के कपड़े पहने जाते हैं. मंगल ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन ‘या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥’ मंत्र का जाप किया जाता है. यह भी पढ़ें: Chaitra Navratri 2020 Wishes: मां दुर्गा के भक्तों को इन शानदार हिंदी WhatsApp Status, Facebook Messages, GIF Greetings, SMS और Wallpapers के जरिए दें चैत्र नवरात्रि की शुभकामनाएं

चंद्रघंटा: मां चंद्रघंटा माता पार्वती का विवाहित रूप है. भगवान शिव से शादी करने के बाद, माता महागौरी ने अपने माथे को आधे चंद्रमा से अलंकृत करना शुरू कर दिया और जिसके कारण माता पार्वती को चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है. वह अपने माथे पर अर्ध-वृत्ताकार चंद्रमा धारण किए हुए है. उनके माथे पर अर्ध चंद्रमा के घंटे की तरह दिखाई देता है, इसलिए माता के इस रूप को चंद्रघंटा के रूप में जाना जाता है. माता बाघिन की सवारी करती हैं, उनके दस हाथ हैं. वह अपने चार दाहिने हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल धारण करती है और पांचवां दाहिना हाथ वरदान मुद्रा में रखती है. वह अपने चार बाएं हाथों में कमल का फूल, तीर, धनुष और जप माला धारण करती है और पांचवें बाएं हाथ को अभय मुद्रा में रखती है. इस दिन सफेद रंग पहना जाता है. शुक्र ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

कूष्माण्डा: माता कुष्मांडा में सूर्य के अंदर रहने की शक्ति और क्षमता है. उनका शरीर सूर्य के समान चमकीला है. माता के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है. वह सफेद कद्दू की बाली पसंद करती हैं, इसलिए उन्हें कुष्मांडा के रूप में जाना जाता है. वह शेरनी की सवारी करती हैं, उनके आठ हाथ हैं. अपने दाहिने हाथों में कमंडल, धनुष, धान्यागार और कमल और बाएं हाथों में अमृत कलश, जपमाला, गदा और चक्र धारण करती हैं. इस दिन लाल रंग के कपड़े पहने जाते हैं, सूर्य ग्रह दिशा और ऊर्जा प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

स्कन्दमाता: जब माता पार्वती प्रभु स्कंद की माता बनीं, तबसे उन्हें स्कंदमाता के नाम से जाना जाने लगा. वह कमल के फूल पर बैठती है और इसी कारण से स्कंदमाता को पद्मासन के नाम से भी जाना जाता है. स्कंदमाता का रंग शुभ्र है, जो उनके सफेद रंग का वर्णन करती है. माता के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों को भी भगवान कार्तिकेय की पूजा का लाभ मिलता है. माता स्कंद को कार्तिकेया के नाम से भी जाना जाता है. माता उग्र सिंह की सवारी करती हैं. अपनी गोद में वे कार्तिकेय के बाल स्वरुप को लिए रहती हैं. भगवान मुरुगन को कार्तिकेय और भगवान गणेश के भाई के रूप में भी जाना जाता है. माता अपने दो हाथों में कमल का फूल, अपने दाहिने हाथ अभय मुद्रा में रखती है. इस दिन रॉयल ब्लू रंग के कपड़े पहनते हैं. बुध ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

कात्यायनी: माता पार्वती ने देवी महिषासुर का वध करने के लिए देवी कात्यायनी का रूप धारण किया. यह देवी पार्वती का सबसे हिंसक रूप है, इस रूप में देवी पार्वती को योद्धा देवी के रूप में भी जाना जाता है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवी पार्वती का जन्म ऋषि कात्या के घर पर हुआ था, जिसके कारण देवी पार्वती के इस रूप को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है. माता शानदार शेर की सवारी करती हैं. उनके चार हाथ हैं. बाएं हाथ में कमल का फूल और तलवार धारण करती हैं. अपना दाहिना हाथ अभय और वरदान मुद्रा में रखती हैं. बृहस्पति ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनते हैं. इस दिन ‘या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

कालरात्रि: जब माता पार्वती ने राक्षसों शुंभ और निशुंभ को मार डाला, तब माता ने अपनी बाहरी स्वर्णिम त्वचा को हटा दिया और माता कालरात्रि का रूप ले लिया. कालरात्रि माता पार्वती का उग्र और चरम रूप हैं. माता कालरात्रि का रंग गहरा काला है. माता कालरात्रि अपने क्रूर रूप में शुभ शक्ति के कारण माता शुभंकरी के रूप में भी जानी जाती हैं.  इनकी सवारी गधा है. इनके चार हाथ हैं. दाहिना हाथ अभय और वर मुद्रा में है, और बाएं हाथ में तलवार और घातक लोहे का हुक है. इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनते हैं. शनि ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

महागौरी: हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता शैलपुत्री सोलह वर्ष की उम्र में बेहद खूबसूरत थीं. माता महागौरी की तुलना शंख, चंद्रमा और कुंद के सफेद फूल से की गई है, क्योंकि वह बेहद गोरी हैं. वह अपनी गौर (श्वेत) आभा के कारण महागौरी के नाम से जानी जाती हैं. माँ महागौरी केवल श्वेत वस्त्र पहनती हैं, जिसके कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा के नाम से भी जाना जाता है. यह बैल की सवारी करती हैं. इनके चार हाथ हैं, माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और अभय मुद्रा में है. वह एक बाएं हाथ में डमरू और वरदान मुद्रा में रखती हैं.मंदिर: हरिद्वार के कनखल में माँ महागौरी को समर्पित एक मंदिर है. इस दिन मोर हरा रंग के कपड़े पहने जाते हैं.राहु ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

सिद्धिदात्री: माता आदि-पराशक्ति, शक्ति की सर्वोच्च देवी, भगवती शिव के बाएं आधे भाग से सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुईं. माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं. यहां तक कि भगवान शिव ने भी माता सिद्धिदात्री की मदद से अपने सभी सिद्धियों को प्राप्त किया था. माता सिद्धिदात्री की पूजा केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि देव, गंधर्व, असुर, यक्ष भी करते हैं. जब माता सिद्धिदात्री शिव के बाएं आधे भाग से प्रकट हुईं, तब भगवान शिव का नाम अर्ध नारीश्वर पड़ा. माता सिद्धिदात्री कमल के आसन पर विराजमान हैं. माता शेर की सवारी करती हैं. उनके चार हाथ हैं. बाएं हाथ में शंख और कमल का फूल है और दाहिने हाथ में गदा और चक्र. इस दिन बैंगनी रंग के कपड़े पहनते हैं. केतु ग्रह सभी के भाग्य का प्रदाता है. इस दिन या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का जाप किया जाता है.

चैत्र नवरात्रि हिंदू कैलेंडर के पहले महीने चैत्र की प्रतिपदा तिथि से शुरू होती है, जिसके कारण इस नवरात्रि को चैत्र नवरात्रि के रूप में जाना जाता है. राम नवमी, भगवान राम का अवतार दिवस, आमतौर पर नवरात्रि के दौरान नौवें दिन आता है, इसलिए इसे राम नवरात्रि भी कहा जाता है. चैत्र नवरात्रि को वसंत नवरात्रि के रूप में भी जाना जाता है.

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